रविवार, 7 अक्टूबर 2018

बेटा समझदार हो गया है

दिन के 2 बजे थे। बेटा कंप्युटर पर सिनेमा देख रहा था। वह अब 15 वर्ष का हो गया है। मेरा मोबाइल कंप्युटर टेबल पर रखा हुआ था और चार्ज हो रहा था।
     मैंने कंप्युटर टेबल से अपना मोबाइल उठाया और चार्ज करने वाले केबल को मोबाइल से अलग किया। फिर धीरे-धीरे वहाँ से पीछे मुड़कर जाने लगा। पीछे से खाँसने की आवाज आई। मुझे लगा शायद बेटे को कुछ कष्ट हो रहा है। पीछे मुड़कर देखा। बेटा मुझे स्विच की ओर इशारा करते हुए दिखा। मैंने स्विच की ओर देखा। स्विच बोर्ड से स्विच अॉफ करना मैं भूल गया था। फिर मुझे वह स्विच जाकर अॉफ करना पड़ा।
     आज के बच्चे अपने से बड़ों के प्रति कितने सजग हो गए हैं। वे बड़े-बूढ़ों की कोई गलतियों को तुरत पहचान लेते हैं। गलतियों पर समय-समय पर अच्छी डांट भी पिलाते रहते हैं। ये कीजिए, वो मत कीजिए। ये पहनिए वो मत पहनिए। ऐसे रहिए, वैसे मत रहिए। जैसे तैसे रहकर बेटे को बेइज्जत मत कीजिए।
     इस उम्र में मेरे बेटे को सही गलत की पहचान हो गई है। यह मेरे लिए बड़ी खुशी की बात है। अब मुझे उस दिन का इंतजार है, जब वह मुझे अपने गोद में लेकर खिलाएगा और मैं अपने बिना दांतों वाले मुंह को चलाता हुआ उसके मुख को एकटक निहारता रहूँगा।

डंडा वाले आचार्यजी

    आज मेरी तबियत कुछ गड़बड़ थी मैंने एक आचार्य से आग्रह किया कि वे कुछ देर मेरी कक्षा में रहें। आचार्य जी तैयार हो गये। जैसे ही वे मेरी कक्षा में पहुँचे, सभी बच्चे उन्हें आश्चर्य से देखने लगे। एक बच्चा रोनी-सी सूरत बनाते हुए बोला - "आचार्य जी, आपकी घंटी नही है।" आचार्य जी बोले - "अरे, तो क्या हुआ? आज तो हम्हीं पढ़ायेंगे।" "नहीं आचार्य जी, आप जाइये। अभी वो आचार्यजी आयेंगे।" - सभी बच्चे एक साथ चिल्लाये।

     अब चौकने की बारी आचार्य जी की थी। उन्होंने पूछा - "कौन आचार्यजी।" 

    एक बच्चे ने कहा - "डंटा वाले आचार्य जी।" आचार्यजी अभी कुछ सोच रहे थे कि मैं वहाँ अपने हाथ में छड़ी लिए पहुँचा। आचार्यजी ने मेरी छड़ी को ध्यान से देखा और कहा - "आप ही हैं डंडा वाले आचार्य जी?" तब आचार्य जी ने मुझे सारी घटना बताई।

    मैंने कहा - डंडा वाले आचार्य जी से बच्चे नहीं डरते हैं, बिना डंडा वाले आचार्य जी से डरते हैं। बच्चे आचार्य का डंडा ही नहीं देखते उनके भाव को भी पहचानते हैं। पर औरों को केवल डंडा ही दिखता है।

शुक्रवार, 21 सितंबर 2018

विद्या ददाति विनयम्

विद्या विनय देती है। विद्या का अर्थ है किसी कला की जानकारी। विनय का अर्थ है नम्रता या घमंड का अभाव। विद्या हमें झुकना सिखाती है। मूर्ति कला, चित्रकला, पाककला, गाने की कला आदि कलाओं में बड़ा सावधानीपूर्वक काम करने की जरूरत है। "मैं जानता हूँ" - ऐसी भावना रखने वाले किसी भी विद्या मे निपुण नहीं हो सकता। यानी "विद्या ददाति विनयम्"।

जो नम्र है, उसकी सभी इज्जत करते हैं। जिसे घमंड है, सभी उसकी निन्दा करते हैं। इसलिए सभी नम्र लोगों का साथ चाहते हैं और घमंडी लोगों से दूर रहना चाहते हैं। यही पात्रता है। यानी - "विनयाद्याति  पात्रत्वाम" ।

जिसकी इज्जत होती है, उसपर विश्वास होता है। उसे लोग अनेक प्रकार की जिम्मेदारी सौंपते हैं। उन्हें अनेक प्रकार के काम सीखने तो मिलता है। काम करने पर धन की प्राप्ति होती है। अतः पात्रता से धन प्राप्त होता है। यानी "पात्रत्वाद् धनमाप्नोति"।

जब पास में धन हो तो हम दान-पुण्य कर सकते हैं। यानी "धनाद्धर्मं "।

अधर्म यानी दूसरे को दुख देना। दूसरे को दुख देने में अपने को भी सुख होनेवाला नहीं है। अतः सुख तो धर्म से ही होता है। अर्थात्

विद्या ददाति विनयमं विनयाद्याति पात्रत्वाम्।
पात्रत्वाद् धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम्।।

शुक्रवार, 14 सितंबर 2018

खुशी

मैं पेड़ को नीचे खड़ा हूँ । सामने की एक दुकान पर एक

वृद्ध व्यक्ति अपने नन्हें पोते को पाँच रूपये का रसगुल्ला खिला रहा है। पोता बड़ा खुश है और बड़े मजे ले-लेकर खा रहा है। कुछ लोग उस बच्चे की क्रिया-कलाप को देखकर खुश हैं।

बगल में सायकिल दुकान है। मिस्त्री ने सायकिल मरम्मत कर दी है। सायकिल वाले ने खुश होकर उसे शायद कुछ ज्यादा ही पैसे दे दिये या पुराना हिसाब भी चुकती  कर दिया होगा। दुकानदार भी बड़ा खुश नजर आ रहा है ।

कुछ विद्यार्थी सड़क पर आपस में बड़े जोश में बातें करते हुए आ रहे हैं। वे भी बड़े खुश नजर आ रहे हैं। हाव-भाव से लगता है वे परीक्षा देकर आ रहे हैं और परीक्षा अच्छी गयी है।

अचानक मेरी बुद्धि चकराने लगी। आखिर खुशी क्या चीज है?

रविवार, 14 मई 2017

मुफ्त की नसीहत

ध्रुवाणि परित्यज्य अध्रुवाणि निषेवते।
ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति अध्रुवाणि नष्टमेव हि।।

जो हमें सरलता से प्राप्त है, उसे छोड़कर अप्राप्त की ओर जाता है, उसकी प्राप्त वस्तु नष्ट हो जाती है। अप्राप्त तो मिला ही नही।

यह श्लोक हमने बचपन में पढा था। अब इसका अर्थ समझ में आ रहा है। मोदी जी अपने माता-पिता के साथ उनके अनुभवों को प्राप्त कर चाय बेच रहे और उसमें अपना अनुभव जोड़कर आज भारत देश के प्रधानमंत्री तक पहुच गये। पर मैंने अपने माता-पिता को बेवकूफ समझकर उनकी बातो पर ध्यान नहीं दिया। हमेशा उनसे अलग चलता रहा। आज मैं सामान्य प्राइवेट विद्यालय का शिक्षक के रूप में रिटायर हो गया। ईश्वर ने माता-पिता के रूप में हमें मुफ्त में गुरू प्रदान किया है। इस अनुपम गुरू का हर प्रकार से सम्मान करना चाहिए। ये गुरू हमें जन्म से ही मुफ्त में अनेक प्रकार की शिक्षा अपने अनुभव से देते रहते हैं। इन शिक्षाओं को आत्मसात कर लेने पर ये ही हमारे आगे की शिक्षा के लिए नींव का काम करते हैं। अतः हमें अपने माता पिता की बातों का सम्मान करते हुए आगे बढ़ने की कोशिश करनी चाहिए।

परफ्सूम की जरूरत

हम गरीब मेहनत करके पसीना बहाते हैं। पसीने की कमाई खाते हैं। मेहनती लोगों के पसीने से हमें खुशबू मिलती हैं। इसलिए हमें एक-दूसरे से मिलने के लिए परफ्यूम की जरूरत नहीं पड़ती। पर अमीरजादे पता नहीं क्या खाते हैं, क्या करते हैं कि उनकी बदबू सहन नहीं होती। वे अपनी बदबू परफ्यूम मार-मार कर छिपाते रहते हैं।

इज्जत और नफरत

टीचर ने एक बच्चे से कहा - राजू हल्ला मत करो। राजू थोड़ी देर बैठा रहा। फिर खड़ा हो गया। टीचर फिर चिल्लाई - राजू, खड़े क्यों हो गये! बैठो। राजू फिर बैठ गया। बैठे-बैठे उसे कुछ काम नहीं सूझा तो आगे बैठे बच्चे को चिकोटी काट ली। वह बच्चा रोने लगा।

टीचर को राजू पर बहुत गुस्सा आया और टीचर ने राजू को दो-चार चपत जड़ दी। गुस्से में वो बोली - राजू, तुम बहुत बदमाश हो गये हो।

पर राजू सोच रहा था। टीचर भी बड़ी अजीब है। उन्होंने कहा हल्ला मत करो तो मैं चुप हो गया। टीचर ने मुझे बैठने कहा तो मैं बैठ गया। अब जरा मजा लेने को आगे वाले को चिकोटी काट ली टीचर ने बबाल मचा दिया। क्या मैं अपने मन से कुछ भी नहीं कर सकता। मेरी तो कोई इज्जत ही नहीं है।

यदि हम राजू की भावना को समझे बिना उससे यही व्यवहार करते रहे तो उसके मन मे टीचर के प्रति डर समा जायगा। यही डर आगे चलकर क्रोध और विरोध का रूप लेता है। फिर वह अपने टीचर से नफरत करने लगता है।

बुधवार, 12 अप्रैल 2017

सुख का अनुभव

     एक घंटे से बैठक लगातार चल रही थी। बिजली को गए हुए भी आधे घंटे से ऊपर हो चुका था। गर्मी झेलते हुए बैठक में रहना बड़ा बुरा लग रहा था। सबके मन में एक ही बात थी कितनी जल्दी बैठक समाप्त हो कि हम बाहर हवा में निकलें। तभी अचानक बिजली आ गई। पंखे घूमने लगे ठंडी हवा का झोंका शरीर को छूने लगा। एक लम्बी बेचैनी को शुकून मिला। अब पता चला कि सुख किसे कहते हैं।
     सचमुच दुःख के बाद ही सुख का आनंद अविस्मरणीय होता है।

गुरुवार, 13 अक्टूबर 2016

माँ दुर्गा का स्वरूप

       










महिषासुर के आतंक से त्राही-त्राहि कर उठे देव और मानवों ने अपनी सामूहिक शक्ति से माता दुर्गा को उत्पन्न किया। उन्हें सभी देवताओं ने अपने-अपने शक्तिशाली आयुध सौंपे। माता दुर्गा ने फिर शेर पर सवार हो भयंकर रूप लेकर महिषासुर का वध किया। तब से चली आ रही यह दुर्गा पूजा हम हिन्दुओं में एकता की शक्ति के रूप में पूजित हो रही हैं। रावण पर विजय पाने के लिए राम ने भी वानर-भालू, वनवासी आदि को एकत्र कर माँ दुर्गा की पूजा दिन की।
        आज हम भी उस सामाजिक एकता की शक्ति देवी दुर्गा की आराधना बड़े मनोयोग से करते हैं।
हमारे सिन्दरी-शहरपुरा के मुख्य क्षेत्र में, लगभग दो कि.मी. के अंदर 12 दुर्गा की प्रतिमा का प्रतिष्ठापन हुआ है, जहाँ सप्तमी से दशमी तक लगातार पूजा धूम धाम से होगी।
        पर मेरे मन में एक सन्देह हो गया है। सभी पांडाल वालों के मन में कुछ बातें रहती हैं, जैसे -
"मेरी दुर्गाजी यहाँ हैं।"
"मैं उनलोगों के साथ दुर्गापूजा नही कर सकता।"
"हमारी मूर्त्ति और पांडाल उनसे अच्छा है।"
"हमलोगों की पूजा अच्छी है। वे लोग तो चोर हैं।"
"लोगों से चंदा दबाव देकर लेना पड़ता है।"
"हमें चंदा अधिक लेना है। चाहे जैसे हो।"

      इससे मुझे लगता है माँ दुर्गा एकता के लिए नहीं लोगों को खंडित करने के लिए है।

कसाई है

बकरे को करूण स्वर मे मिमियाता देखकर एक स्कूल जाता हुआ बच्चे ने पूछा - क्या हुआ? इतना क्यों चिल्ला रहे हो?"
बकरे ने कहा - अरे बेवकूफ, देख नहीं रहे हो? यह कसाई है, कसाई। यह मुझे काटने के लिए ले जा रहा है। मुझे किसी तरह इससे बचाओ"
बच्चे ने कुछ देर सोचा फिर जोर से हँस पड़ा - "अरे, तो इसमें इतना रोने-चिल्लाने की क्या जरूरत है। तम्हारी जान तो एक बार में चली जाएगी। तुम्हें क्या  पता की शिक्षक क्या होते हैं। शुक्र मनाओ कि तुम उनके फेरे मे नहीं पड़े।

मंगलवार, 26 जुलाई 2016

मैं नहीं पढूँगा



मैं अरुण कक्षा में था। प्रार्थना हो रही थी। कुछ बच्चे शान्त भाव बैठ कर प्रार्थना सुन रहे थे, कुछ एक दूसरे की ओर देखते हुए इशारे कर रहे थे, कुछ बच्चे आहिस्ता-आहिस्ता बोल भी रहे थे। पर ओम अपने पीछे वाले बच्चे को तंग करने में मगन था। प्रार्थना के समाप्त होते ही मैं उसके पास गया और उसे गुस्से से देखते हुए एक चपत लगाई और पूछा - "क्या कर रहे थे प्रार्थना के वक्त। सीधा बैठौ।" मैंने पढाई आरंभ की।
श्यामपट पर अ से ञ तक लिखकर बच्चों से पूछा - "यह सब किसे पढ़ने आ गया?" कई बच्चे आगे आए और उन्होंने श्यामपट में देखते हुए पढ़कर सुना दिया। ओम ने कहा - "मुझे आपने मारा था, इसलिए मैं नहीं आऊँगा।"

मैंने उसे हँसते हुए देखा और कहा - "नहीं पढोगे तो फेल हो जाओगे। चलो जल्दी आओ।"
पर वह अपनी जगह से नहीं हिला।
"आते हो कि नहीं?" मैं छड़ी लेकर उसकी ओर लपका।

वह दौड़कर श्याम पट के पास चला गया। और हँसने लगा। मैंने कहा - "चलो पढ़ो।" और उसने सभी पढ़कर सुना दिया। ऐसे होते हैं बच्चे मन के सच्चे।


शनिवार, 16 जुलाई 2016

बच्चे मन के सच्चे

      मैं अरुण कक्षा में पढ़ा रहा था। श्यामपट पर लिख दिया दिया था - अ आ इ ई उ ऊ ऋ ए ऐ ओ औ अं अः। फिर एक लम्बी छड़ी से प्रत्येक अक्षरों को इंगित करते हुए उसकी कविता बोल रहा था। "अनार मीठा खूब खाओ....." बच्चे उन्हें दुहरा रहे थे। इस प्रकार अ से अः तक की कविता मैंने पूरी पढ़ा दी। 
      तभी एक शिशु अपने बेंच से उठा। मैंने उसकी ओर देखा। वह सीधा चलते हुए मेरे सामने आ कर खड़ा हो गया। मैं बड़ी उत्सुकता से उसकी ओर देख रहा था। उसने मुझसे छड़ी माँगी। मैंने सोचा वह भी मेरी तरह पढ़ाना चाहता है। बच्चे तो नकल करते ही हैं। मैंने उसे छड़ी दे दी। उसने वह छड़ी पकड़ी और मेरे जाँघ पर एक छड़ी हल्के से लगाई फिर कहा - आप एक गलती किए थे। फिर वह अपने जगह जाकर बैठ गया। 
      मैं उसे कुछ देर तक अवाक देखता रह गया। बाद में मुझे याद आया कि मैंने एक पंक्ति "ईख उठाकर यहाँ ले आओ" को "ईख तोड़कर यहाँ ले आओ" कह दिया था। फिर मुझे हँसी आ गई। घंटी बज चुकी थी इसलिए मैं कक्षा से बाहर निकल गया। क्या आप इस घटना का कुछ विष्लेशन करना चाहेंगे।

शनिवार, 21 नवंबर 2015

आज का समय

     मैं अपनी सायकिल पर रास्ते मेंं धीरे-धीरे चला जा रहा था। तभी मैंने बायीं ओर से किसी अभिभावक की आवाज सुनी। मैंने सायकिल रोक दी और उस ओर देखने लगा। एक पुराने अभिभावक मुझे हाथ हिलाते हुए पुकार रहे थे - "आचार्य जी, रुकिए। आप छठ पूजा करते हैं।"
     "नहीं।" मैंने कहा, "क्यों?"
     "मैंने सोचा आप पूजा करते होंगे तो कुछ गुगल   (एक प्रकार का फल, जिसकी जरूरत छठ पूजा में पड़ती है) ले जाते।"
     "नहीं, हमलोग तो स्वयं नहीं करते। पर अगल-बगल मदद करते हैं।" मैंने कहा।
     "सायकिल रिप्लेश कीजिएगा।" कोई पीछे से चिल्लाया।
     मैंने पीछे मुड़कर देखा। तबतक वह बहुत आगे निकल चुका था। दो-साथियों के साथ मेरा पुत्र भी सायकिल पर जा रहा था।
     "कौन था?" अभिभावक ने पूछा।
     "मेरा बेटा अपने साथियों के साथ था।"
     अभिभावक थोडी़ देर के लिए शांत हो गए। मैंने उनके आँखों में अनेक प्रकार के प्रश्न आते-जाते देखे। कुछ क्षणों बाद अपने पर नियंत्रण करते हुए उन्होंने कहा -
     "हाँ, आज का समय बहुत बदल चुका है। अब आज के लड़कों को कुछ कहा भी नहीं जा सकता।"
     मै उनके भावों को समझने की कोशिश कर रहा था।
     उनकी चिंता भी स्वभाविक थी। उनके दो बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा मैंने ही प्रदान की थी। उनके दोनों बच्चे अब जवान हो चुके थे। दोनों अब अपने पैरों पर खड़े हो चुके थे। दोनों ही बडे़ सुशील हैं। मुझे आज उनपर गर्व है।

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2015

दुर्गापूजा

हिन्दुओं का सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण पर्व दुर्गापूजा है। इस पूजा की तैयारी महीने भर पहले से ही शुरू हो जाती है। गरीब-से-गरीब घरों में भी तैयारी चलती रहती है। कर्ज लेकर भी नये वस्त्र खरीदे जाते हैं। घर-आँगन कीअच्छी तरह सफाई की जाती है। घर-घर में शक्ति की पूजा आश्विन माह के शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से ही आरंभ हो जाती है और यह दशमी में माता के विसर्जन के साथ समाप्त होती है।

हर मुहल्ले में माता की आराधना के लिए एक या दो भव्य पांडाल खड़े हो जाते हैं। सप्तमी से ही माइक में पंडितों के मुख से शक्ति की उपासना में होते हुए मंत्रोच्चारण सुनाई देने लगते हैं। 

चार दिनों तक लगातार ऊँची आवाज में माइक से कभी भजन कभी सामान्य फिल्मी गाने बजते रहते हैं। ऐसी अवस्था में आपस में आवश्यक बातें करने के लिए भी जगह नहीं मिलती। या जोर-जोर से कुछ बात कर सकते हैं।

तरुणों को धूम-धमाका बिना सब बेकार लगता है। सजावट कुछ विशेष होनी चाहिए। पांडाल से दूर तक आधुनिक इलेक्ट्रिक-इलेक्ट्रोनिक सजावट होनी चाहिए। मूर्ति भव्य होनी चाहिए। पाडांल भी कलात्मक और आधुनिक होना चाहिए। 

आज के समय में माँ की आराधना भी एक फैशन ही हो गया है। बड़े-बड़े पांडाल, पांडाल की सजावट, पांडालों के बीच प्रतियोगितायें, अश्लील गाने, गानो पर अश्लील नृत्य, पांडाल के पीछे होने वाले तामसिक भोजन को देखकर क्या ऐसा लगता है कि हम माता की आराधना कर रहे हैं। जहाँ माँ की आराधना करते-करते कई गाँव और मुहल्ले को एक हो जाना चाहिए था, वहाँ एक गाँव व मुहल्ला कई टुकड़ों मे बँट जाता है। यह कैसी आराधना है? विसर्जन के समय भी अश्लील गानों मे शराब पीकर नाचते हुए देखे जाते हैं।

तीन-चार दिनों के इस त्योहार में इतने खर्च हो जाते हैं जितना सरकार जनता की भलाई के लिए भी खर्च नहीं करती होगी। जो खर्च करती है, उसे जनता तक पहुँचने से पहले ही सरकारी अधिकारी और कर्मचारी ही चट कर जाते हैं।

दुर्गापूजा दशहरा नाम से भी जानी जाती है। माँ दुर्गा को सभी देवताओं ने मिलकर आवाहन किया। फिर सबने मिलकर उन्हें अपने-अपने आयुध सौंपे और माँ दुर्गा ने असुरों का संहार किया।

माँ दुर्गा का अर्थ है एकता की शक्ति। असुर का अर्थ है दुर्विचार। हमें माँ की आराधना की तैयारी करने के लिए पहले अपने अंदर के सारे दुर्विचारों का अंत कर दें। फिर एक-दूसरे से मिलकर दुर्गापूजा धूमधाम से करें। पर आज ऐसा नहीं हो पाता।

यदि हम अपने सोच बदलें तो ये दो-तीन दिन में होने वाले खर्चों को जनता की भलाई के लिए लगायें। इस प्रकार बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि के लिए हमें सरकार के भरोसे नहीं रहना पडेगा। काश ऐसा हो सकता!

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2014

सुख समृद्धि के उपाय (संतुलित आहार-विहार)

सुख-समृद्धि के जिन उपायों की चर्चा मैं करने जा रहा हूँ, वे कोई टोने-टोटके या मंत्र-तंत्र से संबंधित नहीं है। ये वे सामान्य बातें हैं, जो हमारे सामान्य जीवन से संबंधित सामान्य बातें ही हैं। जानते हुए भी प्रायः हमसब इनकी उपेक्षा करते रहते हैं। ये हमारे स्वभाव या प्रकृति से संबंधित हैं। इन उपायों को करने में गरीब-अमीर सभी समान रूप से सक्षम हैं। केवल अपनी प्रकृति को अपने वश में करने का अभ्यास करना होगा। तो आइए हम उन उपायों की चर्चा करते हैं।

1. आहार -
सबसे पहले हमें अपने आहार पर नियंत्रण करने का अभ्यास करना होगा। इसके लिए बहुत अधिक श्रम, व्यय या चिंतन की आवश्यकता नहीं होगी। बस इतना ध्यान दें कि हम जो भी भोजन करते हैं, वह सामान्य हो। रोटी, भात, सब्जी समान्य भोजन हैं। इनकी मात्रा अधिक हो और नियमित हो। शेष भोजन, जैसे - फल, मेवा, तैलीय, चटपटा, बाहरी तैयार सामान की मात्रा कम करें और अपनी आर्थिक क्षमता के अंतर्गत ही करें।

इन उपायों से भोजन का खर्च कम तो होगा, साथ ही समृद्धि भी बढ़ेगी। बिमारियाँ कम होंगी, तनाव कम होगा, बजट संतुलित रहेगा। निरोग रहकर अपनी संपत्ति का सही उपयोग कर सकेंगे।

2. रहन -
'आहार' के साथ 'विहार' शब्द का भी प्रयोग होगा है। 'विहार' को सामान्य भाषा में 'रहन-सहन' भी कहा जा सकता है। मैं 'रहन' और 'सहन' की चर्चा अलग-अलग करना चाहता हूँ। अतः पहले 'रहन' की चर्चा करते हैं।

मैं 'रहन' शब्द का अर्थ आपके या हमारे रहने का ढंग से ले रहा हूँ। अतः कृपया मेरे शब्दों से अधिक मेरे अर्थ की ओर ध्यान दें। भोजन पर नियंत्रण के साथ-साथ हमारे अपने रहने का तरीका या ऐसा कहें हमारे सामान्य जीवन से संबंधित कार्यशैली पर नियंत्रण करना होगा। प्रत्येक कार्य को करने के लिए एक निश्चित विधि का चुनाव करें। इससे आपकी स्मृति बढ़ेगी। कार्य में निखार आएगा। गति में भी वृद्धि होगी। बार-बार विधि बदलने पर कार्यक्षमता घटती है और कार्य के प्रति अरुचि भी होने लगती है। इस प्रकिया का उपयोग हर कार्य में करें। एक-दो सामान्य उदाहरण देता हूँ -
  1. एक विद्यार्थी अब पढ़ाई करना चहता है। विधि होगी - 1. पढ़ाई के लिए स्थान निश्चित करना, 2. पढ़ने के लिए विषय निश्चित करना, 3. उस विषय से संबंधित कॉपी-किताब-कलम-पेंसिल एकत्र करना, 4. अंत में निश्चित स्थान पर बैठकर पढ़ाई आरंभ करना।
  2. एक गृहिणी सब्जी बनाना चाहती है। विधि होगी - 1. उनके पास क्या सब्जी है, देखना, 2. इच्छित सब्जी का चुनाव करना, 3. उन्हें धो-काटकर तैयार करना, 4. तेल-मशाला, बरतन एकत्र करना, 5. चूल्हा जलाना और सब्जी बनाना आरंभ करना।
इसी प्रकार हर कार्य को करने के लिए एक विधि को क्रमशः प्रयोग में लायें। बार-बार विधि न बदलें, विधि का क्रम भी न बदलें। इससे आपके कार्य में निखार आएगा, स्मृति बढ़ेगी, कार्य सही होगा, गलितयाँ आसानी से पहचान कर कार्यविधि में सुधार भी कर सकेंगे।

ऑफिस जाना है, भोजन करना है, कपड़े धोने हैं, घर सफाई करना है - कोई कार्य हो, पहले विधि का चुनाव या निर्माण कर लें। फिर उस विधि से ही हमेशा काम करें।

3. सहन -
'सहन' का अर्थ भी कृपया मेरे ढंग से समझने की कोशिश करेंगे। 'सहन' शब्द से 'सहना' शब्द बनता है। अपने स्वभाव के विपरीत होने पर भी उसे मान लेना - 'सहना' कहलाता है। हम अनेकों कार्य अपने स्वभाव के अनुकूल ही करते हैं। जो मुझे अच्छा लगता है, मैं करूँगा। जो मुझे बुरा लगता है, उसे नहीं करूँगा। मुझे मिठाई अच्छी लगती है, मैं खाऊँगा। ठूँस कर खाऊँगा। कल बीमार हो जाऊँगा। कोई गम नहीं।

ऐसा कैसे चलेगा? कोई गम नहीं? यहाँ मिठाई नहीं खाना या कम खाना, मेरे स्वभाव के विपरीत है। पर मुझे अपने ऊपर नियंत्रण करना होगा। तभी हम सुखी हो सकेंगे।

अनेक स्थानों पर हमें अपने स्वभाव पर नियंत्रण करने की आवश्यकता है। बाजार में सामान खरीदते समय, पॉकेट में पैसे रहने पर खर्च करने में, अपने पास समय रहने पर कार्य का चुनाव करने में आदि। कुछ स्थानों पर अपनी आवश्यकता के लिए वैकल्पिक सामान का भी चुनाव किया जा सकता है। जैसे - टीवी, शो केस, आलमारी, पलंग आदि। टीवी बड़ा लेना या छोटा, अपने कमरे के अनुसार ही लेना। पढ़ाई ज्यादा जरूरी है तो टीवी रंगीन न भी हो तो चलेगा या अभी नहीं लेने से भी चल सकता है।
इन उपायों को अपने घर में लागू करने के लिए मैं पिछले 20 वर्षों से कार्यरत हूँ। पर आज तक पूर्ण सफल नहीं हो पाया। शायद मेरे घर में अनुकूल वातावरण नहीं। फिर भी यह चर्चा मैं आप सबसे कर रहा हूँ। शायद, आपके घर का वातावरण इन उपायों उपयुक्त हो और आपकी सुख-समृद्धि में निरंतर वृद्धि होने लगे। यदि ऐसा हुआ तो कृपया मुझे धन्यवाद देना न भूलें।

गुरुवार, 25 दिसंबर 2014

गुरू परंपरा


मेरे मन में भी एक सवाल बार-बार उठता है कि यह गुरू परंपरा है क्या और इसकी आवश्यकता क्या है। इसके बारे में मैं भी सोचने लगा, बिलकुल आप लोगों की तरह.....।

जन्म लेते ही कोई ज्ञानी या समझदार नहीं होता. उसे किसी चीज की भी कोई जानकारी नहीं होती। पर बच्चे को उसके माता-पिता अपनी समझ और ज्ञान के अनुसार सब कुछ सिखाते हैं। इसलिए माता-पिता बच्चों के पहले गुरू होते हैं। माता-पिता के बाद वे पास-पड़ोस में जाते हैं और वहाँ से अनेक बातों को सीख लेते हैं। इसलिए पास-पड़ोस दूसरे गुरू हुए। पश्चात् वे विद्यालय जाने लगते हैं और अनेक शिक्षक उन्हें अनेक प्रकार का ज्ञान देते हैं। वे तीसरे गुरू हुए। विद्यालय से निकलने के बाद भी उन्हें गुरू तो चाहिए ही, जैसे - नेता, धर्मगुरू, कुल गुरू, व्यवसाय गुरू आदि। यही तो है गुरू परंपरा। और इसकी आवश्यकता भी स्पष्ट समझ में आती है।

आज के नवयुवकों को जाने किसने कह दिया हमें रूढ़ीवाद नहीं होना चाहिए। नया इतिहास बनाना चाहिए। बस इन नवयुवकों ने बड़े-बुजुर्गों से मुँह फेर लिया और चल दिए नया इतिहास बनाने। बुजुर्गों की कोई पूछ नहीं, कोई सम्मान नहीं। तो नवयुवकों के साथ कैसे दिन बिताये। वे किसी वृ्द्धाश्रम में दिन बिताते नजर आते हैं।

भाई, नया इतिहास तो तब बनेगा, जब हम बड़े-बुजुर्गों के अनुभवों को जान लेंगे और उनके अनुभवों का प्रयोग बार-बार करते हुए उन्हें जाँच-परख लेंगे। तभी हम उनके प्रयोगों की कमी और फायदे का निर्णय ले पायेंगे। सही ढंग से जाँचे-परखे बिना बुजुर्गों के अनुभव को गलत ठहराना किसी भी प्रकार लाभकारी नहीं हो सकता।

इन सभी के अतिरिक्त एक बात और है- किसी भी अनुभवों की सही ढंग से जाँच-परख करने पर कुछ नुक्सान दिखेंगे तो कुछ फायदे भी दिखेंगे। उस अवस्था में बिना अनुभव के कोई नया नियम लागू करना भयानक भी हो सकता है। इसलिए पुराने नियमों में ही कुछ सुधार कर प्रयोग में लाना ज्यादा फायदेमंद दिखता है।

इसी प्रकार सुधारवादी प्रक्रियाओं से गुजरकर हिन्दू धर्म में आज का स्वरूप दिखता है। सबसे पहले का सनातन धर्म, फिर साकार-निराकार, शैव-वैष्णव आदि होते हुए लाखों सम्प्रदाय से गुजर कर भी धर्म एक ही है - हिन्दू धर्म। यानी सभी के मूल में सनातन धर्म आज भी विद्यमान है।

यह अद्भुत हिन्दूधर्म इतना विशाल है जिसमें सभी सम्प्रदाय को पचाने की शक्ति है। अन्य धर्मों ने जगत विजय करने के लिए शस्त्रों का सहारा लिया। पर पवित्र हिन्दुधर्म के विस्तार के लिए स्वामी विवेकानंद, आदि गुरू शंकराचार्य, गौतम बुद्ध आदि ने केवल शास्त्र का ही सहारा लिया। यही है हिन्दुओं की गुरू परंपरा।

आज रूस, चीन, अमेरिका आदि बड़े-बड़े विकसित देश की क्या हालत है सभी जानते हैं। इन बड़े विकसित देशों में आत्महत्याओं की संख्या भी बड़ी है। दूर के ढोल सुहावने होते है। प्रारंभ में अनेकों नवयुवक भारत से बड़ी संख्या में अच्छे भविष्य की लालच में उन विकसित देशों में जाते हैं। पर 10-15 साल में ही भारत के गुणगान फिर से शुरू करते हैं। यही है हमारी गुरू परंपरा से संतुलित जीवन का आनंद।

अतः आइये हम भी यह संकल्प लें कि हम अपने गुरू परंपरा का सम्मान करते हुए अपने ही परंपरा को और भी समृद्ध बनाकर संसार का कल्याण करेंगे।
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं  श्रेयः  परधर्मो  भयावहः।।

शनिवार, 7 जून 2014

हमारे बहु-बेटियों की सुरक्षा

आज नारी सुरक्षा की बात बड़े जोरों पर है। नारी की सुरक्षा का जिम्मेदार हम केवल कानून को मान रहे हैं। कोई मजबूत कानून होना चाहिए जिससे अपराधी के मन में डर हो। क्या हमारी जिम्मेदारी नहीं है? क्या समाज की जिम्मेदारी नहीं है? क्या मीडिया का जिम्मेदारी नहीं है? मेरे विचार से हमें निम्नलिखित विंदुओं पर ध्यान देना चाहिए -
  1. घर में - अपने बच्चों को अपनी निगरानी में रखें। उन्हें यौवन को भड़काने वाले गानों, चित्रों और फिल्मों से दूर रखने का प्रयास करें। कुछ समझाकर, कुछ डाँट-फटकार कर, हमेशा प्रयास करें। उन्हें अच्छे-बुरे की पहचान करायें। आवश्यकता से अधिक लाड-प्यार देकर उन्हें अनुशासनहीन और फूहड़ न बना दें।
  2. समाज में - अपने आस-पास के सामाजिक वातावरण पर नजर रखें। आवश्यकतानुसार व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से बहु-बेटियों की सुरक्षा की व्यवस्था करें और असामाजिक व्यवहार और असामाजिक क्रियाकलापों की सूचना सामूहिक रूप से पुलिस को दें।
  3. मीडिया वालों से - मीडिया वालों से भी आग्रह है कि वे यौवन को भड़काने वाले चित्र या प्रचार बंद करें। फिल्म, कहानी, सीरियल आदि में अत्याचार-दुराचार दिखाने के लिए वैसे दृश्य ही दिखायें जिसे देखकर बच्चों के मन में विशेष उत्सुकता न हो। वरना यह मनोरंजन न होकर मनभंजन हो जाएगा।
उपरोक्त विचारों को ध्यान में रखते हुए अपने आस-पास और समाज में एक विशाल जन अभियान छेड़ने की आवश्यकता है। तभी समाज को बढ़ते हुए इस अपराध पर काबू पाया जा सकता है।

सोमवार, 5 मई 2014

शिव-शक्ति


आजकल यह विवाद का विषय हो गया है कि स्त्री-पुरुष में अंतर करना बेवकूफी है। तो क्या स्त्री-पुरुष को एक समझना बुद्धिमानी है। ये कहना तो सही है कि दोनों को समान आदर मिलना चाहिए। पर मौलिक रूप से स्त्री-पुरुष भिन्न होते हैं।
शारीरिक रूप से भिन्नताओं का अनुभव चित्रकारों को स्पष्ट पता है। आँख, होठ, छाती, कमर, कूल्हे, हाथ-पैर, कलाई, गाल आदि के बनावट से स्त्री और पुरुष दोनो ही भिन्न होते हैं।
चित्रकारों को रेखांकन करते समय इनका बड़ा ध्यान रखना पड़ता है।
यदि स्वभाव के बारे में जानना हो तो अभिनेताओं से पूछिए। उन्हें स्त्रियों की पात्रता निभाने में दृष्टि, चाल, बोली, अंदाज सभी का ध्यान रखना पड़ता है। यदि कोई पुरुष स्त्री की पात्रता निभा रहा हो तो कितना भद्दा लगता है, क्यों। क्योंकि उसका स्वभाव, शारीरिक सुड़ौलता आदि स्त्री से मेल नहीं खाती। उसी प्रकार जब एक स्त्री अपने को पुरुष-सा दिखने की कोशिश करती है तो कितनी भद्दी लगती है।
दोनों के शारीरिक बनावट और स्वभाव भिन्न हैं, जो जन्म से ही प्रकृति प्रदत्त हैं। इसलिए दोनों को एक जैसा समझना बेवकूफी। दोनों में आसमान-जमीन का अन्तर है। दोनों को समान आदर मिलना चाहिए, पर दोनों का उपयोग समझ-बूझकर करना चाहिए।
स्त्रियों को प्रकृति से सौंदर्य प्राप्त है। अतः उनके सौंदर्य की सुरक्षा भी होनी चाहिए। शायद इसलिए स्त्रियों को घर के हल्के-फुल्के काम सौंपे गये। परंतु परिस्थिति के अनुसार भारी काम भी स्त्रियों ने दुर्गा, काली, लक्ष्मीबाई, दुर्गावती के रूप में किया।
पुरुषों को शारीरिक गठन की दृष्टि से उत्तम समझा गया। अतः उन्हें बाहरी दौड़-धूप और जिसमें अधिक शक्ति की आवश्यकता थी ऐसे कठिन काम सौंपे गये। पुरुषों को पहलवान, योद्धा और अनवरत यात्री के रूप में उपयोग किया गया।
दोनों की विशेषताओं का हिंदुपरंपरा में जितनी सफलता के साथ प्रयोग किया गया उतनी किसी भी परंपरा में नहीं किया गया। दोनों को ही शिवशक्ति कहकर अलग-अलग रूपों में समान आदर दिया गया पर।
आज भी नर और नारी को काम सौंपने में गहन विचार करने की आवश्यकता है। नारी को नर जैसा समझकर उसके साथ नर जैसा बर्ताव करना, उनके खान-पान, पहनावा, कर्तव्य का ध्यान न रखना नारी के प्रकृति के साथ खिलवाड़ करना ही होगा। इससे भ्रष्टाचार, कदाचार, दुराचार आदि बढ़ेंगे। उनसे हमारी नई पीढ़ी को कौन बचाएगा?


बुधवार, 2 अप्रैल 2014

समस्या औरतों की...

आज के समय में हर ओर से नारे उठ रहे हैं कि नर-नारी को समान समझना चाहिए। दोनों को बराबर अधिकार मिलना चाहिए। दोनों में भेद-भाव नहीं करना चाहिए। नारी को तो किसी मामले में कम नहीं समझना चाहिए।
मेरे मन में से सवाल आता है कि ये सब बातें कैसे आईं कि नर-नारी को समान होना चाहिए। किसके मन में यह भाव आया कि हिन्दू समाज में नारी के महत्त्व को कम आँका जा रही है। नारी को अधिकार कम मिल रहा है।
जब नर-नारी को ईश्वर ने एक नहीं बनाया तो हमारी क्या औकात है। फिर भेद-भाव भी रहेगा ही। पैंट – पैंट है और शर्ट – शर्ट। पैंट की जगह शर्ट का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता और शर्ट की जगह पैंट का इस्तेमाल भी नहीं किया जा सकता। उसी प्रकार नर-नारी के तन-मन, स्वभाव, रुचियाँ आदि अलग-अलग होती हैं।
प्रकृति ने नारियों को पुरुषों के विपरीत सौन्दर्य और कोमलता दी है। नारी अपने सौन्दर्य और कोमलता से सारे संसार को अपनी ओर आकर्षित कर सकती है। सारे संसार को अपने वश में कर सकती है। पर  बुद्धि के मामले में वह हमेशा दूसरों की नकल ही करती है। नकल करके दिखावा करती है कि मैं किसी से कम नहीं। उसके पास दस साड़ियाँ हैं तो मेरे पास ग्यारह तो होनी ही चाहिए। उसके पास दो प्रेशर कूकर है तो मेरे पास बड़े-बड़े दो प्रेशर कूकर होने चाहिए। उसने अपने बाल फलाँ तेल से चमकाये हैं तो मैं ये तेल लूँगी। वह जींस पहनती है तो क्या मैं उससे कम हूँ। और इसी दिखावे के चक्कर में आज की नारी नंगी हो गई। आजकल मोबाईल, टीवी, इण्टरनेट में इसकी होड़ लग गई है कि कौन कितना सेक्सी और हॉट है।
हाँ, लेकिन से बात और मजेदार है। आज की नारियों ने पुरुषों को इतना हद तक आकर्षित किया है कि उनकी बुद्धि और शक्ति धीरे-धीरे नष्ट होती जा रही है। अब वे भी अखाड़े की माटी छोड़ तरह-तरह के क्रीम और परफ्यूम का उपयोग करने लगे हैं। घर-परिवार, समाज सब कुछ भूलकर रात-दिन सेक्सी और हॉट के चक्कर में घूमने लगे हैं।
हमारे एक पड़ोसी की पत्नी ने अपने पति को किसी दूसरे स्त्री के बारे में कहते हुए सुन लिया कि वे बड़ी सेक्सी लगती हैं। बस पाँच दिन से पति-पत्नी की बातचीत बंद है। सुना है अब उनकी पत्नी सेक्सी बनने के लिए कोई कोर्स कर रही हैं।
पहले नारी को शक्ति मानकर पूजा जाता था। आज भी उसी परंपरा के अंतर्गत कन्या भोज कराकर उनकी पूजा की जाती है। यह बात स्पष्ट बताई जाती है कि नारी के बिना पुरुषों का कोई अस्तित्व नहीं। सीताराम, राधेश्याम, गौरीशंकर आदि नाम भी यही सिद्ध करते हैं कि हमने नारियों को पुरूषों से अधिक सम्मान दिया। पर आज नारियों को हो क्या गया है, जो धर्म को छोड़कर अधर्म का साथ दे रहीं हैं।
आप ही फैसला कीजिए क्या दोनों एक से और समान हैं?

बुधवार, 21 अगस्त 2013

रक्षाबंधन



रक्षाबंधन का त्योहार हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है। सामान्य रूप से इसे भाई-बहन के स्नेह- प्रेम का त्योहार माना जाता है। परन्तु यह त्योहार अनेक भावनात्मक रिश्ते से बँधा होता है जो धर्म, जाति और देश की सीमाओं से भी पार कर जाता है। रक्षाबंधन में श्रावण पूर्णिमा का त्योहार भी जुड़ा होता है। यह उपासना और संकल्प का अद्भुत समन्वय कराता है।

रक्षाबंधन में राखी या रक्षासूत्र का महत्व होता है। राखी कच्चे सूत जैसे सस्ती वस्तु से लेकर सोने-चाँदी जैसी मँहगी वस्तु की भी हो सकती है।

इस दिन सभी बहने अपने भाई को दाहिने हाथ में राखी बाँधकर, माथे पर तिलक लगाकर और आरती उतार कर उनके

दीर्घायु होने की कामना करती हैं। बदले में भाई उसकी रक्षा का वचन देता है। ऐसा माना जता है कि रंग-बिरंगे रेशमी धागों का यह त्योहार भाई-बहन के प्यार को अटूट बंधन से बाँधता है। यह पर्व भाई-बहन तक ही सीमित नहीं है। इस पर्व में ब्राह्मणों, गुरुओं और परिवार में छोटी लड़कियों द्वारा सम्मानित संबंधियों (जैसे पुत्री द्वारा पिता को ) भी बाँधी जाती है।

शास्त्रों में कहा गया है - इस दिन अपराह्न में रक्षासूत्र का पूजन और उसके उपरांत रक्षाबंधन का विधान है। यह रक्षाबंधन राजा को पुरोहित द्वारा, यजमान को ब्राह्मण द्वारा, भाई को बहिन द्वारा और पति को पत्नी द्वारा दाहिनी कलाई पर किया जाता है।

संस्कृत की उक्ति के अनुसार -
जनेन विधिना यस्तु रक्षाबंधनमाचरेत। स सर्वदोष रहित, सुखी संवत्सरे भवेत्।।

अर्थात इस प्रकार विधिपूर्वक जिसके रक्षाबंधन किया जाता है वह संपूर्ण दोषों से दूर रहकर संपूर्ण वर्ष सुखी रहता है। 


रक्षाबंधन वास्तव में स्नेह, शांति और रक्षा बंधन है। इसमें सबके सुख और कल्याण की भावना निहित है। वर्तमान काल में परिवार में सभी पूज्य और आदरणीय लोगों को रक्षासूत्र बाँधने की परंपरा भी है। वृक्षों की रक्षा के लिए वृक्षों को रक्षासूत्र तथा परिवार की रक्षा के लिए माँ को रक्षासूत्र बाँधने के दृष्टांत भी मिलते हैं।

रक्षाबंधन की लोकप्रियता कब प्रारंभ हुई यह कहना तो कठिन है, पर समय-समय पर इसके प्रेरक उदाहरण अवश्य मिलते हैं।

स्कन्ध पुराण, पद्म पुराण और श्रीमद्भागवत आदि में रक्षाबंधन के अनेक प्रसंग मिलते हैं। दानवेन्द्र राजा बलि ने जब 100 यज्ञ पू्र्ण किया। इन्द्र और देवताओं को स्वर्ग का राज्य छिने जाने का भय हो गया। उन्होंने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। भगवान ने वामनावतार के रूप में राजा बलि से तीन पग भूमि माँगी। दो ही पग में सारा आकाश और पृथ्वी नाप लिया। तीसरा पग के लिए पूछे जाने पर बलि ने अपना सिर आगे कर दिया। भगवान ने उसपर प्रसन्न होकर उसे रसातल में रहने की जगह दी और उससे वरदान माँगने को कहा। बलि ने भगवान को हमेशा अपने सामने रहने का वचन ले लिया। भगवान के घर न लौटने पर मात लक्ष्मी को चिंता हो गईं। तब नारद जी के कहने पर बलि को रक्षासूत्र बाँधकर माँ लक्ष्मी ने अपना भाई बना लिया और पति को माँग लिया। उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि ही थी। महाभारत की कथा है कि ज्येष्ठ पांडव युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण के कहने पर अपनी सेना की रक्षा के लिए राखी का त्योहार मनाया था। अन्य कथाओं में द्रौपदी द्वारा कृष्ण को तथा कुन्ती द्वारा अभिमन्यु को राखी बाँधने के उल्लेख भी मिलते हैं।

ऐतिहासिक उदाहरणों में जब राजपूत लड़ाई पर जाते थे तो महिलाएँ उनके माथे पर कुमकुम तिलक लगाने के बाद हाथ में रेशमी धागा भी बाँधती थी। उन्हें विश्वास था कि यह धागा उन्हें विजयश्री अवश्य दिलायेगा। मेवाड़ की रानी कर्मावती को बहादुरशाह द्वारा हमला होने की सूचना मिली तो रानी कर्मावती ने मुगल बादशाह को राखी भेजी और सहायता माँगी। हुमायूँ ने मुसलमान होते हुए भी मेवाड़ पहुँच कर रानी कर्मावती और मेवाड़ की रक्षा की। एक अन्य प्रसंगानुसार सिकन्दर की पत्नी ने अपने पति के जीवनदान के लिए हिन्दु राजा पुरु को राखी बाँधकर अपना भाई बनाया। उसके बदले राजा पुरु ने सिकन्दर को जीवनदान दिया।

इस प्रकार यह त्योहार परस्पर एक दूसरे की रक्षा और सहयोग की भावना से आरंभ हुआ। कालांतर में यह लोकप्रिय भी हो गया। रक्षाबंधन हमें एक दूसरे से आत्मीयता और स्नेह के बन्धन से बाँधता है। यह पर्व सामाजिक, पारिवारिक एकसूत्रता की दृढ़ता प्रदान करता है। इस बहाने प्रतिवर्ष बहनें अपने सगे ही नहीं अपितु दूरदराज के रिश्तों के भाइयों को घर जाकर राखी बाँधती हैं या राखी भेजकर अपने स्नेह का नवीनीकरण करती रहती हैं। दो परिवारों और कुलों का संबंध को दृढ़ता प्रदान करता है। समाज के विभिन्न वर्गों के बीच में रक्षा और सहायता की भावना जागृत करता है।

यह त्योहार आज के आधुनिक फ्रेंडशिप से बहुत ऊपर है। अतः इस त्योहार का सिद्धांत और भावना को समझते हुए इसे मनाया जाय तो फ्रेंडशिप जैसे वाहियात और संस्कारविहीन उत्सवों से छुटकारा मिल सकता है।