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रविवार, 28 मार्च 2021

सत्य की खोज

प्रकृति की रचना विचित्र प्रकार से की गई है। कहते हैं - प्रकृति तीन प्रकार के गुणों से निर्मित की गई है - सत्, रज, तम। 

सत् में अच्छाई है और तम में बुराई है। परंतु केवल अच्छाई से जीवन सुखमय और आनंदमय नहीं हो सकता। जैसे सुख का आनंद लेने के लिए दुःख का अनुभव जरूरी है। इसलिए बुराई को भी साथ रखा गया। जहां अच्छाई और बुराई साथ-साथ हो उसे रजोगुण से संबंधित कहा गया

इसका अर्थ है केवल अच्छाई बुरा है। केवल बुराई बुरा है। दोनों को मिलाकर ही दोनों का आनंद लिया जा सकता है।
उपरोक्त बातों को ध्यान में रखते हुए अब विचार करना है सत् (अच्छा) और तम(बुरा) को कितनी मात्रा में मिलाई जाए? इनका समांग मिश्रण और असमांग मिश्रण भी तैयार हो सकता है। जैसे एक मिनट दुख और दूसरे मिनट सुख या एक महीने दुख और दूसरे महीने सुख। अतः अच्छाई और बुराई को मिलाकर एक रज प्रकृति भी है।

हमारा स्वभाव हमेशा अच्छाई की ओर खींचता है। पर उसमें स्वार्थ ही होता है। इसलिए हम अच्छा प्राप्त करने के लिए हर प्रकार का प्रयास करते हैं, पर अपने सुख के लिए। और यहाँ से हमारे अंदर बुराई भी प्रवेश कर जाती है। हम अपने सुख के लिए नौकरी खोजते हैं। वहाँ तक तो ठीक है। लेकिन जब अपनी नौकरी के लिए दूसरे की नौकरी छीनकर स्वयं प्राप्त करने के लिए घूस देकर भ्रष्टाचार करते हैं। यहाँ हम बुरा कर जाते हैं। कोई दूसरा भी घूस देकर मुझे मिलने वाली नौकरी ले जाता है तो वह भी बुरा करता है, भ्रष्टाचार करता है। यदि हम दोनों ही घूस देने को तैयार न हों तो वह नौकरी किसी को नहीं मिलेगी? किसी न किसी को तो मिलेगी ही। यदि हमें नौकरी नहीं मिली तो उससे हमें दुख होगा। यह दुख हम सहने को तैयार हैं तो दुख में भी हमें सुख का अनुभव होगा कि मैंने घूस न देकर किसी की भलाई ही की। घूस से नौकरी लेने वाला दूसरे को दुख देकर सुख ले रहा है। घूस नहीं देनेवाला दूसरे को नौकरी लेता देख सुख का अनुभव कर रहा है। कौन सा सुख सत्य है?


सोमवार, 5 मई 2014

शिव-शक्ति


आजकल यह विवाद का विषय हो गया है कि स्त्री-पुरुष में अंतर करना बेवकूफी है। तो क्या स्त्री-पुरुष को एक समझना बुद्धिमानी है। ये कहना तो सही है कि दोनों को समान आदर मिलना चाहिए। पर मौलिक रूप से स्त्री-पुरुष भिन्न होते हैं।
शारीरिक रूप से भिन्नताओं का अनुभव चित्रकारों को स्पष्ट पता है। आँख, होठ, छाती, कमर, कूल्हे, हाथ-पैर, कलाई, गाल आदि के बनावट से स्त्री और पुरुष दोनो ही भिन्न होते हैं।
चित्रकारों को रेखांकन करते समय इनका बड़ा ध्यान रखना पड़ता है।
यदि स्वभाव के बारे में जानना हो तो अभिनेताओं से पूछिए। उन्हें स्त्रियों की पात्रता निभाने में दृष्टि, चाल, बोली, अंदाज सभी का ध्यान रखना पड़ता है। यदि कोई पुरुष स्त्री की पात्रता निभा रहा हो तो कितना भद्दा लगता है, क्यों। क्योंकि उसका स्वभाव, शारीरिक सुड़ौलता आदि स्त्री से मेल नहीं खाती। उसी प्रकार जब एक स्त्री अपने को पुरुष-सा दिखने की कोशिश करती है तो कितनी भद्दी लगती है।
दोनों के शारीरिक बनावट और स्वभाव भिन्न हैं, जो जन्म से ही प्रकृति प्रदत्त हैं। इसलिए दोनों को एक जैसा समझना बेवकूफी। दोनों में आसमान-जमीन का अन्तर है। दोनों को समान आदर मिलना चाहिए, पर दोनों का उपयोग समझ-बूझकर करना चाहिए।
स्त्रियों को प्रकृति से सौंदर्य प्राप्त है। अतः उनके सौंदर्य की सुरक्षा भी होनी चाहिए। शायद इसलिए स्त्रियों को घर के हल्के-फुल्के काम सौंपे गये। परंतु परिस्थिति के अनुसार भारी काम भी स्त्रियों ने दुर्गा, काली, लक्ष्मीबाई, दुर्गावती के रूप में किया।
पुरुषों को शारीरिक गठन की दृष्टि से उत्तम समझा गया। अतः उन्हें बाहरी दौड़-धूप और जिसमें अधिक शक्ति की आवश्यकता थी ऐसे कठिन काम सौंपे गये। पुरुषों को पहलवान, योद्धा और अनवरत यात्री के रूप में उपयोग किया गया।
दोनों की विशेषताओं का हिंदुपरंपरा में जितनी सफलता के साथ प्रयोग किया गया उतनी किसी भी परंपरा में नहीं किया गया। दोनों को ही शिवशक्ति कहकर अलग-अलग रूपों में समान आदर दिया गया पर।
आज भी नर और नारी को काम सौंपने में गहन विचार करने की आवश्यकता है। नारी को नर जैसा समझकर उसके साथ नर जैसा बर्ताव करना, उनके खान-पान, पहनावा, कर्तव्य का ध्यान न रखना नारी के प्रकृति के साथ खिलवाड़ करना ही होगा। इससे भ्रष्टाचार, कदाचार, दुराचार आदि बढ़ेंगे। उनसे हमारी नई पीढ़ी को कौन बचाएगा?